वसई : कहने को तो वसई-विरार शहर महानगरपालिका स्वास्थ्य सुविधाओं के आधुनिकीकरण पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। मनपा के अस्पतालों में लाखों रुपए की लागत से खरीदी गई सोनोग्राफी मशीनें ‘शोपीस’ बनकर रह गई हैं। डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी के चलते ये मशीनें बंद पड़ी हैं, जिसका सीधा आर्थिक प्रहार गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ रहा है। मशीनें हैं पर चलाने वाले हाथ नहीं शहर में स्वास्थ्य सुविधाओं का जाल बिछाने का दावा करते हुए मनपा प्रशासन ने 2 मातृ एवं शिशु देखभाल केंद्र, 7 अस्पताल और 21 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों सहित कुल 80 से अधिक केंद्र संचालित किए हैं। विडंबना यह है कि इन केंद्रों में अत्याधुनिक सोनोग्राफी सिस्टम तो स्थापित कर दिए गए, लेकिन उन्हें संचालित करने के लिए स्थायी रेडियोलॉजिस्ट (डॉक्टर) की नियुक्ति करना प्रशासन भूल गया।
मरीजों की जेब पर भारी ‘सरकारी लापरवाही’
सरकारी अस्पतालों में मुफ्त या रियायती दरों पर होने वाली सोनोग्राफी सेवा ठप होने के कारण सबसे ज्यादा परेशानी गर्भवती महिलाओं को हो रही है। मजबूरन उन्हें निजी सेंटरों का रुख करना पड़ रहा है, जहां उन्हें मोटी फीस चुकानी पड़ती है। सरकारी अस्पताल में मशीन होने का क्या फायदा जब वह बंद पड़ी है? हमें बाहर से सोनोग्राफी कराने के लिए हजारों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। प्रशासन को आम जनता की तकलीफ दिखाई नहीं दे रही। स्वास्थ्य विभाग ने स्वीकार किया है कि विशेषज्ञों के पद रिक्त होने के कारण यह संकट खड़ा हुआ है। अब प्रशासन इस कमी को भरने के लिए ‘बैठकों’ का सहारा ले रहा है। जल्द ही शहर के निजी सोनोग्राफी डॉक्टरों के साथ एक विशेष बैठक बुलाई जाएगी। प्रशासन निजी डॉक्टरों से अनुरोध करेगा कि वे सप्ताह में कुछ निश्चित समय के लिए सरकारी केंद्रों पर अपनी सेवाएं दें। सरकारी मशीनों का धूल फांकना और जनता का निजी केंद्रों पर लुट जाना, प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
वसई : धूल फांक रही हैं लाखों की सोनोग्राफी मशीनें… डॉक्टर नहीं, इसलिए निजी केंद्रों पर लुटने को मजबूर गरीब मरीज
