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अल्पसंख्यक संस्थाओं में आरक्षण के विरोध में सुप्रीम कोर्ट गई सरकार

मुंबई
बॉम्बे हाई कोर्ट ने 6 महीनों पहले ही यह फैसला दिया था कि महाराष्ट्र में अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों में पिछड़े वर्गों के छात्रों के लिए सीट आरक्षित करने की जरूरत नहीं है। अब महाराष्ट्र सरकार ने इस फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में शरण ली है। महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में डिग्री कॉलेजों में कोटा आरक्षण पर प्रवेश पर रोक लगा दी थी। हाई कोर्ट ने पिछले साल अक्टूबर में दिए अपने ऐतिहासिक फैसले में न्यायाधीश अमजद सईद और एमएस कार्णिक ने मुंबई विश्वविद्यालय के उस 17 साल पुराने परिपत्र को असंवैधानिक बताते हुए रोक लगादी थी, जिसमें आरक्षण संबंधी व्यवस्था थी। इस परिपत्र में उन कॉलेजों में पिछले समुदाय के छात्रों के लिए 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर दी थीं, जिनमें कला, विज्ञान, कॉमर्स और अन्य पेशेवर पाठ्यक्रमों के लिए कक्षाएं लगती हैं। यह परिपत्र 2001 का है।

सेंट जेवियर कॉलेज, जो कि अल्पसंख्यक समुदाय का प्रमुख शैक्षणिक संस्थान है, के प्रिंसिपल फादर जेएम डॉयस और महाराष्ट्र असोसिएशन ऑफ मॉइनरिटीज एजुकेशनल इंस्टिट्यूशंस ने इस फैसले के खिलाफ इसकी वैधता, उपयुक्तता और संवैधानिकता पर रोक लगाने की मांग की थी।

हाई कोर्ट ने इस वर्षों पुराने परिपत्र को खारिज कर दिया था। अब राज्य सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। उसने गर्मियों की छुट्टी के बाद कोर्ट के खुलते ही विशेष याचिका दायर कर दी है। हालांकि यह याचिका हाई कोर्ट के आदेश के 6 महीनों से ज्यादा समय के बाद दायर की है, जबकि नियम 90 दिन में ही दायर करने का है। इस विलंब के लिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से छूट की मांग की है।

याचिका में अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों के साथ हो रहे ‘अन्याय’ के खिलाफ न्याय की मांग की है। यह मामला एक तरह से ‘अत्याधिक न्याय के बीच अत्यधिक अन्याय’ करने का है। सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर सोमवार को सुनवाई होगी। गौरतलब है कि हाई कोर्ट ने 2006 में संवैधानिक संशोधन में ‘अल्पसंख्यक’ शैक्षणिक संस्थानों, जो सरकारी सहायता प्राप्त और प्राप्त नहीं कर रहे थे, को पिछड़े वर्ग के नागरिकों के लिए आरक्षण नीति से छूट दे दी थी।

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