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‘इमरान के आने से भारत-पाकिस्तान रिश्तों में तनाव बढ़ेगा’

पाकिस्तान में आम चुनावों में (जिन्हें जनरल इलेक्शन के बजाए जनरल सलेक्शन भी कहा जा रहा है) जीत हासिल करने के बाद अपनी पहली प्रेस वार्ता में प्रधानमंत्री बनने जा रहे इमरान ख़ान ने एक स्टेट्समैन बनने की कोशिश की.
अपने भाषण के अधिकतर हिस्से में उन्होंने बताया कि वो पाकिस्तान में क्या-क्या बदलाव लाएंगे, किन समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करेंगे और उन्हें सुलझाने के लिए क्या-क्या करेंगे.
प्रशासनिक सुधार, ख़र्च में कटौती, सुधार कार्यक्रम और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने पर उन्होंने ज़ोर दिया.
लेकिन उन्होंने पाकिस्तान की विदेश नीति की सबसे बड़ी चुनौतियों पर भी बात की.
उन्होंने चीन के साथ पाकिस्तान के रिश्तों से शुरुआत करते हुए कहा कि चीन की उपलब्धियां उन्हें प्रेरित करती हैं.
इसके बाद उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के बारे में बात की और वही सब बातें की जो पाकिस्तान के अन्य नेता अब तक करते आए हैं, जैसे कि पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान से अच्छे रिश्ते चाहता है, सीमा पर शांति स्थापित करना चाहता है.. आदि-आदि.

अफ़ग़ानिस्तान के बाद उन्होंने ईरान पर कुछ कहा और फिर मुश्किल समय में पाकिस्तान की मदद करने के लिए सऊदी अरब का शुक्रिया किया.

उन्होंने कहा कि वो मध्य-पूर्व में चल रहे संकटों में वार्ताकार की भूमिका निभाना चाहते हैं.

और उनके भाषण के सबसे अंत में भारत का संदर्भ किसी बुरी दुर्गंध की तरह औपचारिकता के तौर पर आया.

उन्होंने कोई ठोस बात नहीं की, और इसमें कोई हैरत की बात भी नहीं है. न ही कोई नया प्रस्ताव दिया गया और न ही दोनों देशों के रिश्तों में किसी नई शुरुआत की बात की. कोई नया संदेश भी नहीं दिया गया.

जो कहा, वो पहले से कहा जाता रहा है- हम भारत से बात करना चाहते हैं, अगर भारत एक क़दम बढ़ाएगा तो हम दो क़दम बढ़ाएंगे, हम भारत के साथ व्यापार करना चाहते हैं और इससे दोनों ही देशों का भला होगा, हमें अपने मुद्दे सुलझाने के लिए बैठकर बात करनी चाहिए.

और इस सबके बाद वो ‘कश्मीर ही मूल मुद्दा है’ की लाइन पर आ गए. उन्होंने कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की बात कि और ‘कश्मीरियों पर हो रहे ज़ुल्म’ के लिए घड़ियाली आंसू बहाए और फिर कहा कि इस मुद्दे को सुलझाने की ज़रूरत है.
कुछ भारतीय विश्लेषकों ने इमरान के भाषण से उत्साहित होकर एक बटन के इर्द-गिर्द कोट सिलने जैसी कोशिशें की हैं लेकिन तथ्य यही है कि इमरान ने भी वही कहा है जो उनसे पहले के पाकिस्तानी नेता कहते रहे हैं. भारत के साथ रिश्तों को कश्मीर के समाधान से जोड़कर दरअसल उन्होंने एक हाथ से वो वापस ले लिया जो उन्होंने दूसरे हाथ से दिया.

इमरान और उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों (ख़ासकर नवाज़ शरीफ़) में एक फ़र्क ये है कि जब नवाज़ शरीफ़ ने भारत के साथ व्यापार बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था तब इमरान ख़ान ने कहा था कि वो भारत के हाथों पाकिस्तान को बेच रहे हैं. इमरान ख़ान ने नवाज़ शरीफ़ पर अपने हितों के लिए पाकिस्तान के हितों के साथ समझौता करने का आरोप भी लगाया था. उन्होंने कहा था कि नवाज़ शरीफ़ कुछ भारतीय उद्योगपतियों के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों को पाकिस्तान के राष्ट्रीय हित पर तरजीह दे रहे हैं. कम शब्दों में कहा जाए तो उन्होंने नवाज़ शरीफ़ पर देश के साथ गद्दारी का आरोप लगाया था.

नवाज़ शरीफ़ की सरकार पूर्ववर्ती पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार के दौरान किए गए व्यापार समझौते से मुकर गई थी और महत्वपूर्ण बदलावों के साथ नया समझौता किया था जो आख़िरकार सेना के दबाव में लागू नहीं हो सका था. लेकिन इमरान ख़ान ने इस बात का ज़िक्र न ही अपने चुनाव अभियान के दौरान किया और न ही जीत के बाद दिए भाषण में. वो ये भी भूल गए कि उनकी अपनी पार्टी के नेता, ख़ासकर अगले वित्त मंत्री समझे जा रहे नेता, एक से अधिक बार ये कह चुके हैं कि कश्मीर का मुद्दे सुलझे बिना भारत के साथ रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते हैं और यहां तक की व्यापार भी नहीं हो सकता है.

भारत के एक क़दम पर दो क़दम उनके दो क़दम उठाने की बात पर सवाल ये उठता है कि इमरान ख़ान को भारत की ओर आधा क़दम भी उठाने कौन देगा. भारत को लेकर पाकिस्तान की नीति रावलपिंडी के जवान तय करते हैं ना कि इस्लामाबाद के नेता. भारत के साथ रिश्ते आगे बढ़ाने के लिए जो चीज़ें करना ज़रूरी है वो करने में रावलपिंडी वालों की कोई दिलचस्पी नहीं है.

आतंकवाद को लेकर भारत की चिंताओं पर कुछ ठोस ज़मीनी क़दम उठाए बिना पाकिस्तान भारत के साथ रिश्ते को आगे नहीं बढ़ा सकता है. आतंकवाद पर पाकिस्तान की नीयत की असली परीक्षा ये होगी कि वो निष्ठाहीन घोषणाओं के बजाए कुछ करे. कम से कम अब तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है जिससे ये संकेत मिलता हो कि पाकिस्तान भारत के ख़िलाफ़ चल रही जिहाद फ़ैक्ट्री को बंद करने के लिए झूठे वादों से आगे बढ़कर कुछ करना चाहता है.

इमरान ख़ान ने शिकायत की कि भारतीय मीडिया ने उन्हें बॉलीवुड के किसी विलेन की तरह पेश किया. ये शिकायत भी अजीब ही है क्योंकि भारतीय मीडिया ने सिर्फ़ वो ही बातें दोहराई हैं जो पाकिस्तानी मीडिया में और पश्चिमी मीडिया में कही जाती रही हैं. पाकिस्तान में कोई भारतीय संवाददाता मौजूद नहीं है और न ही किसी भारतीय पत्रकार को पाकिस्तान के चुनावों की कवरेज करने की इजाज़त दी गई है.

ऐसे में यदि भारतीय मीडिया में इमरान ख़ान के बारे में कोई राय बनी है तो वो पाकिस्तानी मीडिया की कवरेज पर ही आधारित है. ये पाकिस्तान के अपने बयान और चूकें ही हैं जिनकी वजह से उन्हें ‘तालिबान ख़ान’ का उपनाम मिला और उनकी छवि महिलाओं का शोषण करने वाले व्यक्ति की बनी, उन्हें सेना की कठपुतली समझा गया और भारत विरोधी चरित्र माना गया. भारतीय मीडिया पर उंगली उठाने से पहले, बेहतर होता कि वो अपने कारनामों पर नज़र डालते.

अब सवाल ये उठता है कि क्या इमरान ख़ान भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में कोई बदलाव ला सकेंगे? या क्या वो कोई बदलाव लाने के प्रति गंभीर भी हैं? इन दोनों ही सवालों का जवाब नकारात्मक ही है. सबसे पहले तो नवाज़ शरीफ़ को ‘मोदी का यार और देश का गद्दार’ बताने के बाद इमरान ख़ान ख़ुद अपने ऊपर ये लेबल नहीं चिपकाना चाहेंगे. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि भारत के बारे में कोई फ़ैसला लेने की शक्ति ही उनके पास नहीं होगी. असल खिलाड़ी तो पाकिस्तान की सेना और वहां के कट्टर विपक्षी नेता हैं. इमरान ख़ान जैसे किसी व्यक्ति के पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बन जाने भर से भारत के ख़िलाफ़ भरी हुई नफ़रत समाप्त नहीं हो जाएगी.

भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के आगे बढ़ने की बात तो भूल ही जाइये, हो ये भी सकता है कि ये रिश्ते और भी गर्त में चले जाएं और तनाव और ज़्यादा बढ़ जाए. इसकी वजह ये है कि दोनों देशों के बीच हालात इतने ही ख़राब है जितने युद्ध के दौरान होते हैं, अब इमरान ख़ान के सत्ता संभालने के बाद भारत विरोधी आवाज़ें और ऊंची होंगी. इससे पहले से तनावपूर्ण रिश्ते और पेचीदा हो सकते हैं.
नवाज़ शरीफ़ ने भारत के बारे में कोई अप्रिय टिप्पणी नहीं की और ये नाराज़ करने वाला काम साथियों पर छोड़ दिया. लेकिन इमरान की बात अलग है. न सिर्फ़ उनकी पार्टी के नेताओं बल्कि स्वयं उन्होंने भारत की खुलकर आलोचना की है. उन्होंने अपने लोगों से भारत के प्रति सख़्त रवैया अख़्तियार करने का और भारत से सीधे टकराने के वादे किए हैं. ऐसे में भारत पर ज़बानी मिसाइलें छोड़ने के बाद शांति और संबंध सुधारने की बातें करनी तो आसान है, लेकिन इन्हें अमल में लाना मुश्किल है.

उनकी गर्दन पर सेना की नज़र होगी और सामने चुनावों में धांधली के आरोप लगाने वाला विपक्ष जो उन्हें नीचे खींचने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहेगा. ऐसे में भारत के साथ रिश्तों में कुछ महत्वपूर्ण करना उनके लिए और भी मुश्किल हो जाएगा. इन हालातों में दोनों देशों के बीच कुछ भी वास्तविक प्रगति होने की संभावना बहुत कम है.
यूं तो इसके कारण पाकिस्तान के अपने अंदरूनी हालात हैं लेकिन एक वजह भारत की स्थानीय राजनीति भी है. भारत में अगले साल आम चुनाव होने हैं और उनसे पहले तीन राज्यों में चुनाव होंगे. ऐसे माहौल में कोई भी भारतीय पार्टी पाकिस्तान के साथ संबंध बेहतर करने की बात करती नहीं दिखना चाहेगी. पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने के जुए में कोई भी दल अपने राजनीतिक समर्थन को दांव पर नहीं लगाएगा.

इसका मतलब ये है कि 2019 के मध्य तक भारत और पाकिस्तान के बीच कोई वास्तविक बातचीत होने की संभावना बहुत कम ही है. इन हालातों में बहुत मुमकिन है कि पाकिस्तानी कुछ चालाकी भरे दांव खेले और पश्चिमी देशों का समर्थन हासिल करने की कोशिश करे.

वो सामरिक रूप से संयमित शासन, नियंत्रण रेखा से सैनिकों को वापस लेने वाले अपने फ़ायदे के क़दम भी उठा सकते हैं. पाकिस्तान पहले भी ये सब कर चुका है और भारत ऐसे क़दमों को नकार भी चुका है.
इसके अलावा उम्मीद ये रखिए की दोनों देशों के बीच और तीखे शब्द इस्तेमाल किए जाएंगे और संबंधों में और ज़्यादा तनाव होगा.

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