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यूपी के दम पर चारों दिशाओं में मजबूत सियासी समीकरण साध रही भाजपा

लखनऊ,आसन्न लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों दिशाओं में भाजपा अपनी सियासी मजबूत पकड़ करने में लगी है। राज्यपालों की नियुक्ति और तबादलों में केंद्र सरकार ने यूपी के वरिष्ठ राजनेताओं को खास वरीयता देकर बड़ा सियासी दांव खेला है।

हालांकि राज्यपाल का पद दलीय निष्ठाओं से परे माना जाता है लेकिन पार्टी के रूप में भाजपा की सियासी समीकरण साधने की कोशिश दिखती है। देखा जाए तो यूपी से अब तक पांच राज्यपाल देश के अलग-अलग कोनों में राज्य की बागडोर संभालने वाले या संभाल रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में तो संभवतः पहली बार किसी बरिष्ठ नेता को इस पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

भाजपा के संवैधानिक आधार को मजबूती
उत्तर प्रदेश से अब तक राजस्थान, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में भाजपा के संवैधानिक आधार को मजबूती मिली है। वरिष्ठ भाजपा नेता लालजी टंडन और बेबी रानी मौर्य को नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है।

बिहार से जम्मू-कश्मीर के लिए स्थानांतरित सत्यपाल मलिक भी इसी राज्य के हैं। बिहार के राज्यपाल बनाए गए लालजी टंडन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के काफी करीबी रहे हैं। यही नहीं पश्चिम बंगाल में केशरीनाथ त्रिपाठी और राजस्थान में कल्याण सिंह की मौजूदगी भाजपा की संवैधानिक ताकत का बड़ा आधार है। राज्यपालों की तैनाती में एक बात साफ हो गई कि अटल जी के करीबियों को महत्व दिया गया है।
उत्तर प्रदेश से दूसरी प्रमुख राज्यपाल पद पर तैनात बेबी रानी मौर्य भाजपा की पुरानी कार्यकर्ता हैं और पहले राष्ट्रीय महिला आयोग और अब बाल आयोग से जुड़ी रही हैं। बेबी आगरा के मेयर सहित कई महत्वपूर्ण पदों पर रह चुकी हैं। आगरा को दलित सियासत के एक बड़े केंद्र के रूप में देखा जाता है। बसपा सुप्रीमो मायावती अपनी चुनावी रैलियों की शुरुआत भी आगरा से ही करती रही हैं। जाटव समाज की बेबी रानी मौर्य को उत्तराखंड की राज्यपाल बनाकर दलित एजेंडे को साधा गया है।

जम्मू-कश्मीर में राजनीति तजुर्बा
ऐसे ही बिहार के राज्यपाल सत्यपाल मलिक को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाकर वहां की सियासत को उत्तर प्रदेश से जोड़ने की पहल की गई है। उत्तर प्रदेश के निवासी सत्यपाल मलिक को लंबा राजनीतिक तजुर्बा है। जम्मू-कश्मीर में यह पहला मौका है, जब किसी राजनीति से जुड़े व्यक्ति को राज्यपाल की कुर्सी पर बिठाया गया है। अभी तक नौकरशाही व सेना के पूर्व अधिकारियों को ही जम्मू-कश्मीर में मौका दिया जाता रहा है।

इस कदम को बड़े दांव के रूप में भी देखा जा रहा है। केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के पुनर्वापसी और विस्थापन को लेकर प्रयास शुरू किए हैं। सतपाल के जरिये सरकार जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को राहत देने का काम कर सकती है। इसका संदेश पूरे देश में जाएगा और उत्तर प्रदेश की राजनीति भी इससे प्रभावी होगी।
राज्यपालों की तैनाती के फैसले को भारतीय जनता पार्टी अपनी दलीलों से अपने हक में करने की पहल जरूर करेगी। बानगी के तौर पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को लेकर अक्सर भाजपा सरकार व संगठन के नेता यह कहते सुने जाते हैं कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर दलित के बेटे को भाजपा सरकार ने मौका दिया।

उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य हों या भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय, भाजपा नेता पार्टी के सामाजिक प्रतिनिधि सम्मेलनों में प्राय: यह कहते सुने गए हैं। निश्चित तौर पर राज्यपालों की नियुक्ति में भी ऐसे ही समीकरण को भाजपा जनता तक ले जाने में नहीं चूकेगी।

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